कर्नाटक: 40 साल पहले किए गए एंडोसल्फान छिड़काव का असर आज भी, विकलांग बच्चों की संख्या बढ़ी
कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ में चालीस साल पहले, कैरब के बीजों की उपज बढ़ाने के लिए एंडोसल्फान का छिड़काव किया गया था. हालांकि इसका असर अभी खत्म नहीं हुआ है. आज भी काजू बागानों के आसपास के इलाकों में पैदा होने वाले बच्चे विकलांग पैदा होते हैं. ऐसा कहा जाता है कि जैसे हिरोशिमा और नागासाकी में हुए बम विस्फोटों की वजह से आज भी उन देशों में पैदा होने वाले बच्चे के परिणामस्वरूप विकलांगता के साथ पैदा होते हैं. उसी तरह उत्तर कन्नड़ जिले में 40 वर्ष पहले छिड़के गए रसायनों के प्रभाव अभी भी बने हुए हैं.
उत्तर कन्नड़ जिले में, काजू की पैदावार को कम करने और बीमारी को रोकने के लिए चालीस साल पहले एंडोसल्फान का छिड़काव किया गया था। इसका असर उस क्षेत्र में पैदा होने वाले बच्चों पर पड़ रहा है. इसे प्रभाव को रोका नहीं जा सकता है. रिकॉर्ड के मुताबिक एंडोसल्फान के रासायनिक छिड़काव के परिणामस्वरूप कुल 6,914 लोग, जिनमें दक्षिण कन्नड़ में 3,607 लोग, उडुपी में 1,514 लोग तथा उत्तर कन्नड़ जिले में 1,793 लोग विकलांगताओं से पीड़ित हुए हैं.
पैदा हो रहे विकलांग बच्चे
उत्तर कन्नड़ डीएचओ डॉ. नीरज ने कहा कि इसको लेकर सर्वेक्षण 2015-16 में किया गया था, जिसके बाद 2024 में परित्यक्त मामले पर सर्वेक्षण कराया गया. इस दौरान भटकल, सिरसी-सिद्धपुर, शिराली, कुमटा, होन्नावर और अंकोला में सर्वेक्षण किया गया सर्वेक्षण में 631 नए मामले सामने आए. डीएचओ ने बताया कि विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा जांच भी की गई है. उन्होंने बताया कि विभाग नए पाए गए मामलों की जानकारी प्राप्त करने के बाद पहले से ही विकलांगता प्रमाण पत्र जारी कर रहा है.
सर्वेक्षण का दूसरा चरण
नीरज ने कहा कि पहले सर्वेक्षण में यह पता लगाया गया कि 1985 से 2010-11 तक एंडोसल्फान छिड़काव के प्रभाव से कौन प्रभावित हुआ. वहीं छूट गए लोगों की पहचान के लिए सर्वेक्षण का दूसरा चरण चलाया जा रहा है. ऐसी संभावना है कि दूसरी पीढ़ी का एंडोसल्फान उभर कर सामने आया है, और इसकी जांच की आवश्यकता है. डॉ. ने बताया कि इस मामले में 10 वर्ष से कम आयु का कोई बच्चा नहीं पाया गया.
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