ट्रंप ने की गाजा सीमा के पास अमेरिकी सैन्य अड्डे की तैयारी, रणनीति पर उठे सवाल
तेल अवीव। पश्चिम एशिया में एक नए भू-राजनीतिक बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका गाजा और इजरायल की सीमा पर एक विशाल सैन्य अड्डा बनाने की योजना पर काम कर रहा है। इस अड्डे का उद्देश्य क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती बढ़ाना और जमीनी घटनाओं पर सीधा नियंत्रण स्थापित करना बताया जा रहा है।
खोजी मीडिया रिपोर्ट के हवाले से दावा किया जा रहा, कि अमेरिका इजरायल-गाजा बॉर्डर के पास एक स्थायी बेस की रूपरेखा तैयार कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इस अड्डे पर हजारों अमेरिकी सैनिकों को तैनात करने की संभावना है, जो क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए सीधे हस्तक्षेप कर सकेंगे। हालांकि, इजरायल डिफेंस फोर्स ने इस योजना के बारे में जानकारी से इनकार किया है। आईडीएफ सूत्रों का कहना है कि उन्हें किसी “बड़े अमेरिकी बेस” की अवधारणा के बारे में आधिकारिक रूप से अवगत नहीं कराया गया है। सूत्रों ने यह भी संकेत दिया कि यह योजना फिलहाल केवल सैद्धांतिक स्तर पर है और इसे लागू होने में समय लग सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम अमेरिका की उस दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसके तहत वह मध्य पूर्व में अपनी सैन्य उपस्थिति को मजबूत रखना चाहता है। यह भी चर्चा में है कि पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संभावित रिटर्न प्लान के तहत अमेरिका फिर से क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है। गौरतलब है कि गाजा युद्ध में दो वर्षों तक जारी भीषण संघर्ष के बाद पिछले महीने युद्धविराम लागू हुआ था, लेकिन सीजफायर के बावजूद तनाव और छिटपुट हमले जारी हैं। ऐसे में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को इजरायल और फिलिस्तीन दोनों के लिए सुरक्षा संतुलन के रूप में देखा जा रहा है।
इस बीच, अमेरिका ने अक्टूबर में ही किर्यत गत में एक नया सिविल-मिलिट्री कोऑर्डिनेशन सेंटर (सीएमसीसी) स्थापित किया है, जहां सैकड़ों अमेरिकी सैनिक और अधिकारी पहले से तैनात हैं। सेंटकॉम अधिकारियों के अनुसार, यह केंद्र गाजा से जुड़ी मानवीय और सैन्य गतिविधियों के समन्वय का कार्य कर रहा है। राजनयिक सूत्रों का कहना है कि यदि गाजा सीमा पर यह नया अमेरिकी अड्डा बनता है, तो यह न केवल इजरायल की सुरक्षा नीति को प्रभावित करेगा, बल्कि मध्य पूर्व की शक्ति-संतुलन की दिशा को भी बदल सकता है। विश्लेषक इसे पोस्ट-वार रीजनल रिअलाइनमेंट की शुरुआत मान रहे हैं, जहां अमेरिका की भूमिका सिर्फ सहयोगी नहीं, बल्कि निर्णायक बन सकती है।
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