मंच पर लड़खड़ाए बृजभूषण, सुरक्षा कर्मी रह गए हक्के-बक्के
लखनऊ|भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह मंच पर अचानक मुंह के बल गिर गए और गुलाटी खा गए। इस दौरान पास में खड़े सुरक्षाकर्मी उन्हें बचाने की कोशिश करते रह गए लेकिन उन्हें गिरने से रोक नहीं पाए। थोड़ी देर के लिए सुरक्षाकर्मियों के साथ-साथ हर कोई हक्का-बक्का रह गया लेकिन गिरने के तुरंत बाद बृजभूषण शरण सिंह उठे और मुस्कुराने लगे। उन्हें मुस्कुराता देख सबने राहत की सांस ली। अब इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो आठ जनवरी का बताया जा रहा है। इस दिन बृजभूषण शरण सिंह का 69 वां जन्मदिन भी था।मौका गोंडा के नंदनी नगर में आयोजित आठ दिवसीय राष्ट्र कथा महोत्सव के समापन समारोह का था। इसमें संत ऋतेश्वर महाराज को कथा के लिए आमंत्रित किया गया था। आठ जनवरी को कथा का समापन भी था और बृजभूषण शरण सिंह का जन्मदिन भी। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में मंच पर चढ़ते समय बृजभूषण शरण सिंह का संतुलन बिगड़ गया। सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें संभालने का प्रयास किया लेकिन बृजभूषण गुलाटी खाते हुए मुंह के बल गिर जाते हैं। वह जिस तरह से गिरे उसे देखकर वहां मौजूद हर कोई हक्का बक्का रह गया।
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बृजभूषण शरण सिंह को जन्मदिन पर खूब मिली बधाइयां
सरयू तीरे नंदनी निकेतन में एक जनवरी से आयोजित राष्ट्रकथा महोत्सव का भव्य समापन पूरे विधि विधान के साथ कथा महोत्सव के मुख्य आयोजक पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के जन्मदिन के अवसर पर हुआ। कथा विराम के बाद सद्गुरु ऋतेश्वर महाराज ने पूर्व सांसद के जन्मोत्सव पर न केवल विशेष उद्बोधन दिया बल्कि गोमाता पालन का आह्वान किया।जन्मोत्सव के अवसर पर विभिन्न कार्यक्रमों की सतरंगी छटाओं के बीच पूर्व सांसद बृजभूषण शरण पर बधाईयों की जमकर बारिश हुई। बड़ी संख्या में जुटे चाहने वालों ने पूर्व सांसद को अपने अपने तरीके से शुभकामनाएं दीं। इस दौरान सद्गुरु ऋतेश्वर महाराज ने कहा कि दसवीं शताब्दी के पूर्व तक भारत विश्वगुरु था और इसका मुख्य कारण गोमाता की पूजा और सम्मान था। जब तक गोमाता प्रत्येक भारतीय घर में पूजनीय और प्रतिष्ठित नहीं होगी, तब तक भारत पुनः विश्वगुरु नहीं बन सकता। गोमाता को केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी समझना आवश्यक है।
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महराज ने गोपालन का आह्वान किया। सद्गुरु ने बताया कि यूरोपीय देशों में अनाज और सब्जियों की पैदावार कम होने के कारण वे मांसाहारी हो गए और गाय को भी मारकर खाने लगे। भारत में आजादी की जंग की शुरुआत 1857 में हुई थी। कारतूस में लगी गाय की चर्बी को मुँह से हटाने की प्रक्रिया का विरोध करते हुए मंगल पाण्डेय ने गोरे शासन के खिलाफ बिगुल फूँका था। महात्मा गांधी ने भी स्वतंत्र भारत में गोवध पर रोक लगाने की बात कही थी। उन्होंने कहा कि आजादी के समय हमारी जनसंख्या के बराबर गायों की संख्या थी।
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