वारंगल में देवी का अद्भुत मंदिर! जहां भद्रकाली की बाईं आंख में लगा था कोहिनूर हीरा, जानें कैसे पहुंचा अंग्रेजों तक?
19 मार्च से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो रही है, जो 27 मार्च तक है. चैत्र नवरात्रि में मां भगवती के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है, जो देश के हर हिस्से में विद्यमान हैं, लेकिन क्या आप मां के ऐसे उग्र रूप के बारे में जानते हैं कि जिनका संबंध कोहिनूर हीरे से था. आज हम आपको वारंगल की भद्रकाली मां के चमत्कारों के बारे में बताएंगे, जिस पर कई बार आक्रमण हुआ, लेकिन मंदिर आज भी मजबूती से खड़ा है. लेकिन कोहिनूर हीरा अंग्रेजों के पास पहुंच गया.
भद्रकाली झील के किनारे है देवी का मंदिर
तेलंगाना के वारंगल में स्थित भद्रकाली मंदिर भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है, जो देवी भद्रकाली को समर्पित है. वारंगल और हनमकोंडा शहरों के बीच एक पहाड़ी की चोटी पर भद्रकाली झील के किनारे स्थित इस मंदिर का निर्माण 625 ईस्वी में चालुक्य साम्राज्य ने कराया था.
काकतीय वंश के राजा ने भेंट की कोहिनूर
हालांकि इतिहास में मंदिर के निर्माण का श्रेय काकतीय वंश से भी जोड़कर देखा जाता है, जहां के राजा ने मां भद्रकाली को कोहिनूर भेंट किया था.
दिल्ली सल्तनत के मंदिर पर आक्रमण करने से पहले मंदिर में पत्थर की विशाल मां भद्रकाली की प्रतिमा स्थापित थी. काकतीय राजा प्रतापरुद्र द्वितीय ने खदान से निकलने कोहिनूर हीरे को सुरक्षित रखने के लिए मां भद्रकाली की बाईं आंख में लगवा दिया था.
आक्रमणकारियों ने हमला कर ले लिया कोहिनूर
लेकिन दो शताब्दियों के बाद मंदिर पर आक्रमणकारियों ने हमला किया और मंदिर को खंडित करके कोहिनूर को अपने साथ ले गए. मंदिर आक्रमणकारियों के राज में कई सालों तक वीरान पड़ा रहा. दिल्ली के मुस्लिम शासकों से होते हुए वह कोहिनूर अंग्रेजों तक पहुंच गया.
1950 से पूर्व दोबारा हुआ मंदिर का निर्माण
1950 से पहले लोगों ने आपसी सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया और धातु से बनी और रत्न जड़ी प्रतिमा की स्थापना की. 1950 के बाद ही मंदिर में भक्त दोबारा दर्शन के लिए जा रहे हैं और आज मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला, समृद्ध इतिहास और आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है.
गर्भगृह में है धातु और रत्नों से जड़ी प्रतिमा
मंदिर के गर्भगृह में मां की धातु और रत्नों से जड़ी प्रतिमा स्थापित है, जिनकी आठ भुजाएं हैं और आठों भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र स्थापित हैं. मां भद्रकाली का यह स्वरूप ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक है. मूल रूप से यह मंदिर नागर शैली में निर्मित है, जिसमें एक वर्गाकार गर्भगृह, एक पिरामिडनुमा शिखर और एक स्तंभों वाला हॉल है.
खास बात यह भी है कि स्थानीय मान्यता रही है कि जिसने भी कोहिनूर को पाने का लालच किया, वो हमेशा बर्बाद हुआ, चाहे वो मुगल आक्रमणकारी हों या फिर फारसी या अंग्रेज शासक. जिसने भी कोहिनूर को पाया, वो बर्बाद ही हुआ. माना जाता है कि कोहिनूर सिर्फ मां भद्रकाली के पास ही संरक्षित था.
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