आबकारी विभाग में नियमों की अनदेखी का खेल, कमिश्नर दीपक सक्सेना को गुमराह करने की कोशिश?
लाइसेंस निलंबन के बाद बची बीयर के निपटान को लेकर नियमों की व्याख्या पर विवाद, विभागीय अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल
ग्वालियर। मध्यप्रदेश के आबकारी विभाग में इन दिनों बीयर के अतिशेष स्टॉक को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सूत्रों के अनुसार विभाग के कुछ अधिकारी नियमों की आड़ लेकर ईमानदार आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना को गुमराह करने की कोशिश में लगे हुए हैं, ताकि कुछ कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाया जा सके। आबकारी नियमों के अनुसार यदि किसी फुटकर विक्रेता की अनुज्ञप्ति (लाइसेंस) निलंबित या समाप्त हो जाती है, तो उसके पास बचा हुआ मादक पदार्थ (जैसे बीयर) सीधे बाजार में नहीं बेचा जा सकता। इसके लिए स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित है।
नियम 25 के अनुसार क्या है प्रावधान
नियम 25 के तहत फुटकर विक्रेता के पास बचा हुआ स्टॉक (अतिशेष) निम्न परिस्थितियों में ही निपटाया जा सकता है
यदि विक्रेता को उसी परिसर के लिए नई अनुज्ञप्ति मिलती है, तो वह पुरानी अनुज्ञप्ति समाप्त होने के बाद भी अपने भंडार के अतिशेष को नई अनुज्ञप्ति के लिए सुरक्षित रख सकता है। यदि नई अनुज्ञप्ति किसी अन्य परिसर के लिए है, तो विक्रेता को पुरानी दुकान का पूरा स्टॉक ऐसे व्यक्ति के पास जमा करना होगा जिसे जिला आबकारी अधिकारी इस कार्य के लिए नियुक्त करे। इसके बाद ही आबकारी उपनिरीक्षक स्तर से कम नहीं किसी अधिकारी की अनुमति से यह स्टॉक नई दुकान में ले जाया जा सकता है। यदि विक्रेता को नई अनुज्ञप्ति नहीं मिलती, तो उसे अपना पूरा बचा हुआ स्टॉक जिला आबकारी अधिकारी द्वारा नियुक्त व्यक्ति के पास जमा करना होगा। इसके बाद जिला आबकारी अधिकारी की पूर्व अनुमति से उसी वर्ग के किसी अन्य अधिकृत विक्रेता को थोक में बेचा जा सकता है।

नियम 34 में शुल्क परिवर्तन की स्थिति
यदि किसी मादक पदार्थ पर शुल्क (ड्यूटी) कम या ज्यादा किया जाता है, तो कलेक्टर के आदेश के अनुसार विक्रेता को अपने भंडार को उसी दिन शाम तक उस व्यक्ति के पास जमा करना होगा जिसे आबकारी अधिकारी नियुक्त करे।
इसके बाद भंडार का सत्यापन किया जाता है और नया शुल्क लागू होने की तारीख से 30 दिनों के भीतर उसका समायोजन किया जाता है।
नियम क्या कहते हैं
यदि जमा किया गया भंडार नष्ट कर दिया जाता है, तो उस पर शुल्क का अंतर नहीं लिया जाएगा।
और यदि वह भंडार किसी अन्य अधिकृत विक्रेता को स्थानांतरित किया जाता है, तो स्थानांतरण से पहले ही शुल्क का अंतर वसूल किया जाएगा।
आबकारी डिप्टी कमिश्नरों की भूमिका पर सवाल
सूत्रों का कहना है कि इन स्पष्ट नियमों के बावजूद कुछ अधिकारी अलग-अलग व्याख्या कर मामले को उलझाने की कोशिश कर रहे हैं। आरोप है कि इसी बहाने कुछ कंपनियों को उनके पुराने स्टॉक को बाजार में बेचने की अप्रत्यक्ष अनुमति दिलाने की कोशिश की जा रही है।
बड़ा सवाल
अब देखना यह होगा कि आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना इस पूरे मामले में क्या कदम उठाते हैं और क्या विभागीय नियमों का सख्ती से पालन करवा पाते हैं या नहीं
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