पैरेंट्स अलर्ट: बच्चों की इस आदत को नजरअंदाज करना पड़ सकता है महंगा
लाइफस्टाइल और खानपान की गड़बड़ी ने कई तरह की क्रॉनिक बीमारियों का खतरा बढ़ा दिया है। केवल बुजुर्ग या फिर युवा ही नहीं बच्चे भी इसका शिकार हो रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, पिछले एक दशक में बच्चों का खानपान काफी तेजी से बदला है। बच्चों की प्लेट से दाल-चावल और सब्जियों की जगह पिज्जा, बर्गर और जंक फूड्स की मात्रा काफी बढ़ गई है।स्कूल का टिफिन हो या लंच-डिनर बच्चे जंक फूड्स को सबसे ज्यादा पसंद कर रहे हैं। माता-पिता की व्यस्त जिंदगी ने फास्ट फूड को और आसान विकल्प बना दिया है। पर ये आदत असल में सेहत के लिए बहुत नुकसानदायक हो सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जीवन के जिस समय में सबसे ज्यादा पोषक की जरूरत होती है, उसमें जंक फूड्स का डाइट में शामिल होना काफी चिंताजनक है। यही कारण है कि कम उम्र में ही मोटापा, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और हृदय रोग जैसी जानलेवा समस्याएं काफी बढ़ती जा रही हैं। बच्चों को क्रॉनिक बीमारियों के चंगुल से बचाने के लिए जंक फूड्स से बचाना सबसे जरूरी है। कहीं आपका बच्चा भी तो ज्यादा जंक फूड्स नहीं खा रहा है?स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बच्चे जंक फूड्स का आदी होते जा रहे हैं। जंक फूड में मौजूद ज्यादा नमक, चीनी और अनहेल्दी फैट न सिर्फ उनकी शारीरिक सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि उनके मानसिक विकास पर भी असर डालते हैं।
बच्चों में क्यों बढ़ रही है जंक फूड्स की आदत
बच्चों में ये आदत क्यों तेजी से बढ़ती जा रही है? इसको लेकर एक हालिया अध्ययन में विशेषज्ञों ने बताया कि बच्चों और किशोर जंक फूड के विज्ञापन दिखकर दिनभर में औसतन 130 कैलोरी ज्यादा खा रहे हैं।यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल में हुए इस अध्ययन में पाया गया कि हाई फैट, सॉल्ट और शुगर (एचएफएसएस) वाले फूड के विज्ञापन सिर्फ 5 मिनट तक देखने के बाद 7 से 15 साल के बच्चे दिनभर में दो ब्रेड स्लाइस के बराबर कैलोरी ज्यादा खा लेते हैं। यूरोपियन कांग्रेस ऑन ओबेसिटी में ये अध्ययन प्रकाशित है।
अध्ययन में क्या पता चला?
इस अध्ययन 240 बच्चों को शामिल किया गया, जिन्हें चार तरह के मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पांच-पांच मिनट के विज्ञापन दिखाए गए। इनमें टीवी जैसे वीडियो, सोशल मीडिया की इमेज पोस्ट, रेडियो जैसे ऑडियो और बिलबोर्ड जैसे स्टैटिक फॉर्मेट शामिल थे।
- रिपोर्ट में सामने आया कि जिन बच्चों ने जंक फूड के विज्ञापन देखे, उन्होंने स्नैक्स में औसतन 58 और लंच में 72 कैलोरी ज्यादा खाईं।
- कुल मिलाकर उन्होंने 130 कैलोरी ज्यादा लीं, जबकि नॉन-फूड विज्ञापन देखने वाले बच्चों में यह नहीं देखा गया।
प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर एमा बॉयलैंड कहती हैं, इस अध्ययन से पता चलता है कि फूड मार्केटिंग बच्चों की खाने की आदतों को कैसे प्रभावित करती है। सिर्फ कुछ मिनटों की एक्सपोजर से ही बच्चे ज्यादा खाने लगते हैं, जो लंबे समय में वजन बढ़ने का कारण बन सकता है।अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिन बच्चों का बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) ज्यादा था, उन्होंने और भी ज्यादा कैलोरी खपत की। हर एक यूनिट बीएमआई बढ़ने पर बच्चे ने औसतन 17 कैलोरी ज्यादा खाईं।
बच्चों में तेजी से बढ़ता जा रहा है मोटापा
बच्चों में मोटापे की समस्या वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ती जा रही है, जो कई गंभीर और जानलेवा बीमारियों की जड़ मानी जाती है। भारतीय आबादी में इसका खतरा और भी ज्यादा है।
- भारत में बचपन के मोटापे के मामले 2040 तक बढ़कर 56 मिलियन तक पहुंचने की आशंका है, जो 2025 की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि है। मोटापे के शिकार बच्चों में डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर से लेकर कैंसर तक का खतरा अधिक हो सकता है। जंक फूड्स और शारीरिक गतिविधियों में कमी मोटापे का प्रमुख कारण है।
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