मुर्शिदाबाद बना सियासत का रणक्षेत्र, SIR विवाद से बढ़ी हलचल
मुर्शिदाबाद : मुर्शिदाबाद के रेलवे स्टेशन पर इन दिनों दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद जैसे महानगरों से लौटने वाले प्रवासियों का तांता लगा हुआ है। यह भीड़ केवल घर वापसी नहीं, बल्कि चुनाव के बदलते मिजाज का संकेत है। धूलियां गांव के मोहम्मद शेख जैसे कई लोग हैं जिन्हें कथित तौर पर यह धमकी मिली है कि यदि वे मतदान करने नहीं आए, तो उनका राशन कार्ड रद्द कर दिया जाएगा।
प्रवासियों के लिए यह चुनाव केवल नेता चुनने का नहीं, बल्कि अपना वजूद बचाने का जरिया है। कभी नवाबों की शान रहे मुर्शिदाबाद की पहचान अब गरीबी और पलायन से होने लगी है, लेकिन राजनीति के पटल पर यह जिला आज भी पश्चिम बंगाल का 'एपिसेंटर' बना हुआ है।
सत्ता का गलियारा और राजनीतिक समीकरण
मालदा और मुर्शिदाबाद की यह बेल्ट राज्य की लगभग 60 सीटों पर अपना गहरा प्रभाव रखती है। 2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने यहाँ की 22 में से 20 सीटें जीतकर एकतरफा कब्जा किया था। हालांकि, इस बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी बिसात ऐसी बिछाई है कि TMC के लिए पुरानी जीत दोहराना चुनौती बन गया है। इस बार मुकाबला केवल दो पक्षों में नहीं, बल्कि कांग्रेस, वामपंथ और बागी उम्मीदवारों के चलते चतुष्कोणीय हो चुका है।
प्रमुख सीटों का रण: कहीं सहानुभूति तो कहीं बगावत
1857 की क्रांति की गवाह रही इस धरती पर चुनावी शोर इस बार पहचान और ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द सिमटा है:
बहरामपुर: यहाँ कांग्रेस के दिग्गज अधीर रंजन चौधरी का दबदबा अब भी बरकरार है। पिछली बार बाहरी उम्मीदवार को चुनने की 'भूल' को लेकर मतदाताओं में एक तरह का प्रायश्चित देखा जा रहा है। टीएमसी सांसद यूसुफ पठान की 'सेलिब्रिटी' छवि के मुकाबले अधीर चौधरी को मिलने वाली स्थानीय सहानुभूति उनके पक्ष को मजबूत कर रही है।
रेजिनगर-नाओदा: टीएमसी के बागी नेता हुमायूं कबीर अपनी अलग पार्टी बनाकर मैदान में हैं। उन्होंने अल्पसंख्यक मतों को साधने के लिए 'बाबरी मस्जिद' जैसे संवेदनशील मुद्दों का कार्ड खेला है, जिससे तृणमूल के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगने का खतरा पैदा हो गया है।
मुर्शिदाबाद (नगर): यहाँ मुख्य मुकाबला भाजपा के गौरीशंकर घोष और टीएमसी की शाओनी सिंह राय के बीच है। भाजपा की उम्मीदें हिंदुत्व कार्ड और अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे पर टिकी हैं। वहीं, वक्फ कानून जैसे मुद्दों पर बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों ने मुकाबले को और रोचक बना दिया है।
मुर्शिदाबाद का यह चुनाव 'बाहरी बनाम अपने' और 'पहचान की राजनीति' के बीच फंसा हुआ है। प्रवासियों की घर वापसी और स्थानीय नेताओं की आपसी रंजिश यह तय करेगी कि बंगाल की सत्ता का यह 'पावर सेंटर' इस बार किसके पाले में जाएगा।
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