पंजाब धमाकों पर घमासान, भगवंत मान ने BJP पर लगाए आरोप, पलटवार तेज
अमृतसर: पंजाब के धमाकों पर सियासी संग्राम, मुख्यमंत्री ने भाजपा पर लगाए गंभीर आरोप तो विपक्ष ने मांगा इस्तीफा
पंजाब के अमृतसर और जालंधर में मंगलवार की रात हुए सिलसिलेवार धमाकों ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इन घटनाओं की जांच के बीच सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी को निशाने पर लेते हुए इसे आगामी चुनावों की तैयारी करार दिया है। श्री आनंदपुर साहिब में मीडिया से मुखातिब होते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि भाजपा अक्सर चुनाव जीतने के लिए डर और हिंसा का माहौल पैदा करती है, जो पंजाब की शांति के लिए खतरा है। मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद राज्य में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है, जहाँ भाजपा ने मुख्यमंत्री से अपने आरोपों के पुख्ता सबूत देने या फिर पद से त्यागपत्र देने की मांग की है।
सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र की विफलता पर विपक्ष के तीखे प्रहार
राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विपक्ष ने सरकार को चारों तरफ से घेर लिया है। शिरोमणि अकाली दल के नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने इसे खुफिया तंत्र की भयानक विफलता बताते हुए कहा कि सेना और बीएसएफ जैसे संवेदनशील ठिकानों के बाहर धमाके होना कोई छोटी बात नहीं है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि जब सीमावर्ती राज्य के छावनी क्षेत्र और रेलवे ट्रैक सुरक्षित नहीं हैं, तो आम जनता की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है। वहीं, कांग्रेस विधायक सुखपाल खैरा और विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने भी मुख्यमंत्री पर हमला बोलते हुए कहा कि पंजाब को इस वक्त राजनीतिक चुटकुलों की नहीं बल्कि एक सुरक्षित वातावरण की जरूरत है। उन्होंने सरकार को चेतावनी दी कि पंजाब अब अस्थिरता का एक और दौर बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है।
केंद्र और राज्य सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने इन धमाकों के लिए मुख्यमंत्री भगवंत मान के साथ-साथ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को भी जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि जहाँ एक ओर राज्य सरकार अपने प्रचार में व्यस्त है, वहीं केंद्र सरकार की नीतियां पंजाब की कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने का काम कर रही हैं। दूसरी ओर, सांसद सुखजिंदर रंधावा ने मुख्यमंत्री के बयान को उनकी अपरिपक्व राजनीति का परिचायक बताया। रंधावा का मानना है कि अपनी नाकामियों को केंद्र पर थोपना यह दर्शाता है कि राज्य सरकार सुरक्षा में हुई चूक को सुधारने के बजाय राजनीतिक कीचड़ उछालने में अधिक रुचि ले रही है, जो भविष्य में राज्य के लिए राष्ट्रपति शासन जैसी स्थिति की नींव रख सकता है।
शांति बहाली की चुनौती और जनता के बीच फैला अनिश्चितता का माहौल
इन धमाकों और उसके बाद शुरू हुई बयानबाजी ने आम जनता के भीतर असुरक्षा की भावना को और गहरा कर दिया है। जहाँ एक ओर प्रशासन धमाकों की प्रकृति और इसके पीछे के साजिशकर्ताओं की पहचान करने में जुटा है, वहीं नेताओं की आपसी खींचतान ने जांच की दिशा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के विवादित बयान ने इस आग में घी डालने का काम किया है, जिसमें उन्होंने इन धमाकों को देश के लिए कोई नई बात नहीं बताया। फिलहाल, पंजाब सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती कानून-व्यवस्था पर जनता का विश्वास फिर से बहाल करना है, क्योंकि सुरक्षा और स्थिरता ही राज्य के युवाओं और भविष्य के लिए सबसे जरूरी प्राथमिकता बनी हुई है।
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