ईरान वार्ता के बीच अमेरिका का बड़ा कदम, ‘Project Freedom’ ऑपरेशन पर लगाई रोक
वॉशिंगटन: मध्य पूर्व में गहराते सैन्य संकट के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक चौंकाने वाला कदम उठाते हुए 'ऑपरेशन प्रोजेक्ट फ्रीडम' को शुरू होने के मात्र तीन दिन बाद ही अस्थायी रूप से रोकने का आदेश दिया है। सामरिक रूप से संवेदनशील 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' में फंसे व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने के लिए बनाया गया यह सैन्य मिशन अब कूटनीतिक वार्ताओं की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है।
कूटनीतिक वार्ता और ईरान पर निरंतर दबाव
राष्ट्रपति ट्रंप ने इस सैन्य अभियान को रोकने के पीछे ईरान के साथ चल रही उच्च स्तरीय कूटनीतिक बातचीत को मुख्य वजह बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान जैसे सहयोगी देशों के विशेष अनुरोध और एक संभावित समझौते की गुंजाइश को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। हालांकि, अमेरिका ने अपना कड़ा रुख बरकरार रखा है और ईरान के विरुद्ध की गई समुद्री नाकेबंदी को खत्म नहीं किया है। इस कड़े प्रतिबंध का सीधा अर्थ यह है कि न तो ईरान का कोई जहाज इस समुद्री मार्ग का उपयोग कर सकेगा और न ही बाहरी जहाज ईरान की सीमा में प्रवेश कर पाएंगे।
सुरक्षा चुनौतियां और जमीनी हकीकत
रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ द्वारा स्थिति को काबू में बताने के दावों के विपरीत, 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' के शुरू होते ही क्षेत्र में हिंसा की घटनाएं बढ़ गई थीं। अमेरिकी चेतावनी के बावजूद ईरान ने न केवल सैन्य व व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाया, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात पर भी हमले किए। मंगलवार को एक मालवाहक जहाज पर हुए रहस्यमयी हमले ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि क्षेत्र में शांति की स्थिति अत्यंत नाजुक है। इन हमलों ने अमेरिकी सुरक्षा कवच की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे तनाव कम होने के बजाय और अधिक उलझ गया है।
व्यापारिक जगत का अविश्वास और सामरिक रणनीति
अमेरिकी सुरक्षा के बड़े वादों के बावजूद वैश्विक शिपिंग कंपनियों के बीच अविश्वास का माहौल बना हुआ है। भारी तैनाती के बाद भी पहले दिन केवल दो अमेरिकी जहाज ही इस मार्ग से निकले और दूसरे दिन यह संख्या शून्य पर पहुंच गई। वर्तमान में सैकड़ों जहाज होर्मुज के मुहाने पर फंसे हुए हैं क्योंकि कंपनियां किसी भी प्रकार का जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं। जानकारों का मानना है कि ट्रंप का यह कदम ईरान के साथ सीधे सैन्य टकराव को टालने और कूटनीति के जरिए बीच का रास्ता निकालने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
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