धमतरी में रेशम की चमक: 'सिल्क समग्र-2' से संवर रही ग्रामीणों की तकदीर, किसान बन रहे आत्मनिर्भर
रायपुर : छत्तीसगढ़ के किसान शहतूत की पत्तियों का उपयोग रेशम के कीड़ों के पालन के लिए करते हैं, जिससे वे कोकून बेचकर अच्छी कमाई करते हैं, वहीं इसके फलों को बाजार में बेचकर भी मुनाफा कमाते हैं। किसानों के लिए आमदनी का एक बेहतरीन और आधुनिक विकल्प बनकर उभरी है, जिससे वे न केवल आत्मनिर्भर बन रहे हैं, बल्कि अपनी आय भी दोगुनी कर रहे हैं। धमतरी जिले में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिए केंद्र सरकार की 'सिल्क समग्र-2' योजना एक गेम-चेंजर साबित हो रही है। परंपरागत खेती पर निर्भर रहने वाले किसान अब रेशम उत्पादन के जरिए अपनी आय को दोगुना कर रहे हैं। जिले में 37 किसानों ने सफलतापूर्वक शहतूत पौधरोपण कर रेशम पालन की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, जो न केवल जिले बल्कि पूरे राज्य के लिए प्रेरणा बन रहे हैं।
कम जमीन, अधिक मुनाफा: एक एकड़ में 1.5 लाख रुपए तक की आय
यह योजना विशेष रूप से लघु एवं सीमांत किसानों के लिए वरदान है। जिन किसानों के पास 5 एकड़ से कम भूमि है, वे मात्र 1 एकड़ में शहतूत की खेती कर साल भर में 5 से 6 बार कृमिपालन कर सकते हैं। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, खर्च काटकर किसान सालाना 1 लाख से 1.5 लाख रुपये तक की शुद्ध आय प्राप्त कर रहे हैं। इस योजना के तहत हितग्राहियों को 5 लाख रुपए तक की आर्थिक सहायता दी जाती है। किसानों को वैज्ञानिक तरीके से रेशम उत्पादन के लिए शासन द्वारा अनुदान दिया जा रहा है।पौधरोपण व सिंचाई के लिए 60-60 हजार के दो चरण में 1.20 लाख रुपए, कृमिपालन गृह निर्माण के लिए 3.25 लाख रुपए उपकरण एवं सामग्री के लिए 55 हजार रुपए दिया जाता है। इस तरह कुल सहायता राशि का 80% केंद्र सरकार और 20% राज्य सरकार वहन कर रही है।
टसर कोसा और धागाकरण:महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल
शासकीय टसर विकास केन्द्र बिरेझर ग्रामीण महिलाओं की आत्मनिर्भरता का केंद्र बन गया है। यहाँ 15 से अधिक महिलाएं घर के कामकाज के साथ धागाकरण का कार्य कर रही हैं, जिससे उन्हें हर महीने लगभग 12 हजार रुपये की अतिरिक्त आय हो रही है। वहीं, 20 से अधिक ग्रामीण टसर कृमिपालन से जुड़कर सालाना 50 हज़ार रुपए तक की अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं। सिल्क समग्र-2 योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने का सशक्त माध्यम है। इस योजना के तहत अधिक से अधिक युवाओं और महिला स्व-सहायता समूहों को वैकल्पिक आय के स्रोत से जोड़ना है ताकि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ें।
आधुनिक प्रशिक्षण और वैज्ञानिक पद्धति
रेशम विभाग न केवल संसाधन जुटा रहा है, बल्कि किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण भी दे रहा है। वैज्ञानिक पद्धति से कीटपालन सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाता है, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में सुधार हुआ है। धमतरी जिले में सिल्क समग्र-2 के ये सकारात्मक परिणाम स्पष्ट करते हैं कि यदि सही योजना और सरकारी सहायता का मेल हो, तो ग्रामीण भारत आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से कदम बढ़ा सकता है।
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