लोरमी शिक्षा विभाग में नया विवाद, संकुल समन्वयक नियुक्ति पर जांच की मांग
मुंगेली। लोरमी विकासखंड के शिक्षा विभाग में संकुल समन्वयक की पदस्थापना को लेकर एक नया प्रशासनिक विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि प्रभारी विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) ने उच्च अधिकारियों और आवश्यक प्रशासनिक स्वीकृति को ताक पर रखकर एक सहायक शिक्षक को संकुल समन्वयक का महत्वपूर्ण प्रभार सौंप दिया। इस आदेश के सामने आने के बाद से ही स्थानीय स्तर पर शिक्षा विभाग की पूरी कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
बिना उच्च अनुमोदन के जारी हुआ आदेश, प्रक्रिया पर खड़े हुए सवाल
विभागीय सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, शासकीय प्राथमिक शाला खैरवार खुर्द में पदस्थ सहायक शिक्षक (एलबी) नारद तेंदुलकर को संकुल हरदी का नया संकुल समन्वयक नियुक्त करने का लिखित आदेश जारी किया गया है। नियमों के जानकार और स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह संवेदनशील नियुक्ति जिले के सक्षम प्राधिकारी यानी कलेक्टर के संज्ञान में लाए बिना और उनकी अनिवार्य प्रशासनिक स्वीकृति के बगैर ही कर दी गई। प्रचलित नियमों के अनुसार, इस तरह के पदों पर पदस्थापना के लिए उच्चाधिकारियों का औपचारिक अनुमोदन बेहद जरूरी माना जाता है। हालांकि, इन प्रशासनिक कमियों और आरोपों की अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।
विवादों से पुराना नाता: एडवांस भुगतान का भी लगा है गंभीर आरोप
यह पहला मौका नहीं है जब शिक्षक नारद तेंदुलकर का नाम किसी विवाद में आया हो। इससे पहले भी वे कथित वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर सुर्खियों में रह चुके हैं। जनपद सदस्य सुरजीत भार्गव ने इस मामले में उच्च स्तर पर लिखित शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि संकुल समन्वयक के पद पर आधिकारिक और विधिवत नियुक्ति होने से पहले ही, उक्त शिक्षक के नाम पर लगभग 80 हजार रुपये की राशि का भुगतान कर दिया गया था।
शिकायतकर्ता का दावा है कि जिस तारीख को यह बड़ी धनराशि ट्रांसफर की गई, उस समय संबंधित शिक्षक आधिकारिक तौर पर उस पद की जिम्मेदारी नहीं संभाल रहे थे। ऐसे में बिना पदभार ग्रहण किए सरकारी खजाने से किए गए इस भुगतान ने विभागीय साख को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
नियमों की अनदेखी पर तीखी आपत्ति और विभागीय जांच की उठती मांग
शासन के कड़े दिशा-निर्देशों के मुताबिक, संकुल समन्वयक जैसे महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और जिला स्तर पर कलेक्टर की अंतिम मुहर के बाद ही आदेश जारी किए जाते हैं। क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और सजग नागरिकों ने इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी आपत्ति दर्ज कराई है। उनकी मांग है कि बिना अनुमोदन के आदेश जारी करने और पद स्थापना से पहले किए गए भुगतान, दोनों ही गंभीर मामलों की एक निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि नियमों का उल्लंघन साबित होता है, तो दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए और जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए।
मामले पर जिला शिक्षा अधिकारी का आधिकारिक बयान
इस पूरे घटनाक्रम पर जब जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) से पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो उन्होंने कहा कि फिलहाल यह मामला उनके संज्ञान में सीधे तौर पर नहीं आया है और न ही उन्हें अभी इसकी पूरी आधिकारिक जानकारी है। हालांकि, उन्होंने आश्वस्त किया कि यदि इस संबंध में कोई औपचारिक लिखित शिकायत प्राप्त होती है या प्राथमिक स्तर पर किसी भी प्रकार की वित्तीय या प्रशासनिक अनियमितता के सबूत मिलते हैं, तो विभाग नियमों के तहत कड़ी वैधानिक कार्रवाई अमल में लाएगा।
प्रशासनिक कार्रवाई और जांच रिपोर्ट पर टिकीं सबकी नजरें
फिलहाल, नियुक्ति और भुगतान से जुड़ा यह दोहरा विवाद पूरे जिले के प्रशासनिक गलियारों में जमकर चर्चा का विषय बना हुआ है। जहां एक तरफ पूर्व में हुए कथित संदिग्ध भुगतान की अंदरूनी फाइलें खंगाली जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया में बरती गई जल्दबाजी ने शिक्षा विभाग की कार्यशैली को संदिग्ध बना दिया है। अब क्षेत्र के लोगों के साथ-साथ विभागीय कर्मचारियों की नजरें भी आने वाली विभागीय जांच और जिला प्रशासन के कड़े रुख पर टिकी हुई हैं।
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