नियमितीकरण के लिए सेवा की निरंतरता आवश्यक
प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि सरकारी नियुक्ति में समान अवसर का संवैधानिक उपबंध है, लेकिन लंबी सेवा के बाद नियमों के तहत सेवा नियमित किए जाने का अधिकार भी है। इसके लिए ‘निरंतर सेवा’ आवश्यक है और इसका एकमात्र अपवाद निरंतर सेवा में कृत्रिम व्यवधान है जहां नियोक्ता द्वारा कर्मचारी को काम करने से रोका गया हो।
ऐसे मामलों में नियमितीकरण से इन्कार नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्र तथा न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की खंडपीठ ने आगरा स्थित सरकारी उद्यान में माली के रूप में कार्यरत महावीर सिंह व पांच अन्य की विशेष अपील स्वीकार कर ली है और चयन समिति को याचियों का पक्ष सुनकर नए सिरे से विचार करने निर्देश दिया है।
कोर्ट ने कहा कि जब तक नियमों में निरंतर काम करने की आवश्यकता को शामिल नहीं किया जाता, तब तक नियमितीकरण नियम को इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि यह संविधान के अनुच्छेद 16 का उल्लंघन है। याचीगण का कहना था कि वे 1998 से 2001 के बीच अलग-अलग तिथियों पर आगरा के सरकारी उद्यान में माली के रूप में जुड़े। कुछ कृत्रिम अवकाश को छोड़कर आज तक लगातार काम कर रहे हैं।
उन्होंने 12 सितंबर, 2016 की अधिसूचना के क्रम में नियमितीकरण के लिए आवेदन दिया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट की एकल पीठ ने राहत देने से इन्कार कर दिया था। हालांकि कहा था कि किसी भी तरह के कृत्रिम ब्रेक को नजरअंदाज किया जाएगा और इसे याचिकाकर्ताओं के खिलाफ नहीं पढ़ा जाएगा।
आगरा क्षेत्र के उप निदेशक (उद्यान) ने 14 अक्टूबर, 2019 के आदेश के तहत याचीगण के दावे को इस आधार पर खारिज कर दिया कि उन्होंने लगातार काम नहीं किया था। सेवा में निरंतरता नहीं थी। खंडपीठ ने कहा, याचीगण महावीर सिंह, महावीर, गगन देव, चरण सिंह और नईम की नियुक्ति कट आफ तिथि से पहले हुई थी और वे नियमितीकरण नियम 2016 के लागू होने पर लगातार काम कर रहे हैं।
याची संतोष कुमार उर्फ शांति प्रसाद 2004-05 से लगातार काम कर रहे हैं, जबकि उनकी प्रारंभिक नियुक्ति के बारे में रिकार्ड उपलब्ध नहीं है। कोर्ट ने कहा कि प्रश्न यह है कि सेवा निरंतरता में अवरोध स्वैच्छिक है या विभाग द्वारा सेवा करने से रोका गया है। यदि रोका गया है तो सेवा की निरंतरता में कृत्रिम अवरोध को स्वीकार नहीं किया जाएगा और निरंतरता मानी जाएगी।
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